रविवार, 30 अगस्त
यहोवा टूटे मनवालों के करीब रहता है।—भज. 34:18.
चाहे दूसरों ने आपके साथ बुरा व्यवहार किया हो, पर आप यकीन रख सकते हैं कि यहोवा आपसे प्यार करता है और आप उसकी नज़र में बहुत अनमोल हैं। अगर आप “कुचला हुआ” महसूस कर रहे हैं, तो याद रखिए कि यहोवा ने आपमें कुछ अच्छा देखा है, इसलिए उसने आपको अपनी तरफ खींचा है। (यूह. 6:44) वह आपसे बेइंतिहा प्यार करता है और आपकी मदद करने के लिए हमेशा तैयार है। यीशु ने जिस तरह लोगों के साथ व्यवहार किया, उससे हम समझ सकते हैं कि यहोवा हमें कितना अनमोल समझता है। जब यीशु धरती पर था, तो कुछ लोगों को नीची नज़रों से देखा जाता था और लोग उन्हें बुरा-भला कहते थे। लेकिन यीशु उनके साथ प्यार से पेश आया और उसने उन पर दया की। (मत्ती 9:9-12) जैसे एक बार एक औरत जिसे एक बड़ी बीमारी थी, यीशु के पास आयी। वह ठीक होना चाहती थी, इसलिए उसने यीशु के कपड़े को छुआ और उसकी बीमारी दूर हो गयी। तब यीशु ने उसे डाँटा नहीं, बल्कि उसे दिलासा दिया और उसके विश्वास के लिए उसकी तारीफ की। (मर. 5:25-34) यीशु बिलकुल अपने पिता यहोवा की तरह है। (यूह. 14:9) इसलिए उसके बारे में पढ़कर हम समझ सकते हैं कि यहोवा हमारे बारे में कैसा महसूस करता है। हम यकीन रख सकते हैं कि यहोवा की नज़र में हम बहुत अनमोल हैं और वह हमारे अंदर अच्छाइयाँ देखता है। वह देखता है कि हमारा विश्वास कितना मज़बूत है और हम उससे कितना प्यार करते हैं। प्र24.10 पेज 7 पै 4-5
सोमवार, 31 अगस्त
दया करके मेरे आँसुओं को अपनी मशक में भर ले।—भज. 56:8.
दाविद की ज़िंदगी में बहुत-सी मुश्किलें आयीं और उसने कई बार आँसू बहाए। कई लोग उससे नफरत करते थे और उसके परिवारवालों और दोस्तों ने भी उसे धोखा दिया। (1 शमू. 19:10, 11; 2 शमू. 15:10-14, 30) एक बार दाविद इतना दुखी था कि उसने लिखा, “आहें भरते-भरते मैं पस्त हो चुका हूँ। मैं पूरी रात अपना बिस्तर आँसुओं से भिगोता हूँ, आँसुओं के सैलाब में मेरा दीवान डूब जाता है।” (भज. 6:6) दाविद की ज़िंदगी में कई मुश्किलें तो आयीं, पर उसे यकीन था कि यहोवा उससे प्यार करता है और वह उसके साथ है। उसने लिखा, “यहोवा मेरा बिलखना ज़रूर सुनेगा।” (भज. 6:8) आज के वचन से पता चलता है कि यहोवा हमसे कितना प्यार करता है और उसे हमारी कितनी परवाह है। उसने कहा कि यहोवा मानो उसके आँसुओं को एक बोतल में भर रहा है और उसके पास एक किताब में उसके एक-एक आँसू का हिसाब लिखा है। दाविद को पूरा भरोसा था कि यहोवा उस पर ध्यान दे रहा है और जानता है कि वह किस मुश्किल से गुज़र रहा है। यही नहीं, यहोवा को यह भी पता है कि इस सबकी वजह से उस पर क्या बीत रही है। प्र24.12 पेज 22 पै 11-12
मंगलवार, 1 सितंबर
खुद को जाँचते रहो कि तुम विश्वास में हो या नहीं।—2 कुरिं. 13:5.
यह सच है कि प्रौढ़ बनने के लिए हमें मेहनत करनी है, लेकिन इसके बाद भी हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम आगे भी प्रौढ़ बने रहें। हमें कभी ऐसा नहीं सोचना चाहिए, ‘मेरा तो यहोवा के साथ मज़बूत रिश्ता है, मुझे और मेहनत करने की ज़रूरत नहीं।’ (1 कुरिं. 10:12) इसके बजाय हमें लगातार ‘खुद की जाँच’ करनी है और यहोवा के साथ अपना रिश्ता मज़बूत करते जाना है। प्रेषित पौलुस ने कुलुस्से के मसीहियों को जो चिट्ठी लिखी, उसमें एक बार फिर उसने इस बात पर ज़ोर दिया कि हमें प्रौढ़ बने रहना है। वैसे तो वहाँ के भाई-बहन प्रौढ़ थे, फिर भी पौलुस ने उन्हें खबरदार किया कि वे दुनिया की सोच ना अपना लें। (कुलु. 2:6-10) उसने अपनी चिट्ठी में इपफ्रास का भी ज़िक्र किया जो शायद कुलुस्से के भाई-बहनों को अच्छी तरह जानता था। उसने लिखा कि इपफ्रास उनके लिए लगातार प्रार्थना कर रहा था कि वे ‘मज़बूत खड़े रहें’ यानी प्रौढ़ बने रहें। (कुलु. 4:12) पौलुस और इपफ्रास से हम क्या सीखते हैं? यही कि अगर हम प्रौढ़ बने रहना चाहते हैं, तो हमें परमेश्वर से मदद लेनी होगी, लेकिन साथ ही हमें खुद भी मेहनत करनी होगी। पौलुस और इपफ्रास भी यह बात जानते थे, तभी वे चाहते थे कि कुलुस्से के भाई-बहन मुश्किलों के बावजूद प्रौढ़ बने रहने के लिए मेहनत करते रहें। प्र24.04 पेज 6 पै 16-17